Article summary
Abstract
प्रस्तुत शोध-लेख रामायण में दास-प्रथा और प्राचीन भारतीय सामाजिक संरचना में रामायण में वर्णित
दास-प्रथा का ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता
है कि रामायणकालीन समाज में दास-प्रथा एक सुव्यवस्थित सामाजिक संस्था के रूप में विद्यमान थी, जिसका
स्वरूप केवल पराधीन श्रम तक सीमित न होकर राजकीय, पारिवारिक तथा धार्मिक जीवन से भी घनिष्ठ रूप से
जुड़ा हुआ था। वैदिक साहित्य में प्रयुक्त दस्यु एवं दास शब्दों के अर्थ-विकास का विवेचन करते हुए यह
प्रतिपादित किया गया है कि प्रारम्भ में युद्धबंदी एवं पराजित समुदायों के लिए प्रयुक्त ‘दास‘ शब्द उत्तरकाल में
सेवक एवं आश्रित व्यक्ति का बोधक बन गया। रामायण में दासों एवं दासियों का उल्लेख मुख्यतः राजपरिवारों,
सामन्तों तथा उच्चवर्गीय परिवारों के संदर्भ में प्राप्त होता है। सीता-विवाह, दान-प्रथा, राजकीय उपहार तथा
वनगमन जैसे प्रसंगों से ज्ञात होता है कि दास-दासियाँ तत्कालीन सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था का अभिन्न
अंग थीं। लेख में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि रामायणकालीन दास-प्रथा का स्वरूप अन्य प्राचीन
सभ्यताओं की अपेक्षा अपेक्षाकृत अधिक मानवीय था। स्वामी और दास के मध्य संबंध केवल स्वामित्व पर आधारित
न होकर संरक्षण, उत्तरदायित्व, निष्ठा एवं कर्तव्यपरायणता से भी जुड़े हुए थे। दासों के भरण-पोषण, सुरक्षा तथा
जीवन-निर्वाह का उत्तरदायित्व स्वामी पर था, जबकि दास पूर्ण समर्पण एवं निष्ठा के साथ सेवा करते थे।
रामायण के आधार पर यह भी स्पष्ट होता है कि दास-प्रथा तत्कालीन सामाजिक पदानुक्रम, वर्ण-व्यवस्था,
आर्थिक संसाधनों तथा राजकीय वैभव का महत्वपूर्ण अंग थी। इस प्रकार यह अध्ययन रामायण के माध्यम से
प्राचीन भारतीय समाज की सामाजिक संरचना, आर्थिक संबंधों तथा सांस्कृतिक मूल्यों को समझने में महत्वपूर्ण
आधार प्रदान करता है।
