भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु और कुटीर उद्योगों की भूमिकाः विशेषकर बिहार के संदर्भ में
डॉ. सीमा कुमारी, सहायक प्राध्यापिका, अर्थशास्त्र विभाग, गौतम बुद्ध महिला कॉलेज, गया
DOI: 10.70650/rpimj.2026v2i100005
DOI URL: https://doi.org/10.70650/rpimj.2026v2i100005
Issue: Vol. 2 ★ Issue 1 ★ January-March 2026
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सरांश:

यह शोध-पत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों की भूमिका का विश्लेषण विशेष रूप से बिहार के संदर्भ में प्रस्तुत करता है। भारत में लघु एवं कुटीर उद्योग प्राचीन काल से ही आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं और ये रोजगार सृजन, गरीबी उन्मूलन तथा क्षेत्रीय विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। बिहार जैसे कृषि-प्रधान राज्य में इन उद्योगों की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि ये स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक कौशल तथा श्रम शक्ति का उपयोग करते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाते हैं। इस अध्ययन में लघु एवं कुटीर उद्योगों के आर्थिक महत्व, रोजगार सृजन, आय वितरण, उत्पादकता, निर्यात संभावनाओं तथा ग्रामीण-शहरी संतुलित विकास में इनके योगदान का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, बिहार में इन उद्योगों की ऐतिहासिक प्रवृत्तियों, वर्तमान आर्थिक स्थिति, प्रवासी आय, मूल्य श्रृंखला तथा संकट-कालीन प्रभावों का भी अध्ययन किया गया है। शोध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि शासन-नीतियाँ, वित्तीय साधन, तकनीकी उन्नयन, गुणवत्ता मानक और कौशल विकास कार्यक्रम इन उद्योगों के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। बिहार के चयनित जिलों के उदाहरणों के माध्यम से इन उद्योगों की सफलताओं और चुनौतियों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। अध्ययन के निष्कर्ष से स्पष्ट होता है कि यदि उचित नीतिगत समर्थन, वित्तीय सहायता, तकनीकी सुधार और विपणन व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए, तो लघु एवं कुटीर उद्योग बिहार तथा भारत की समग्र आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

मुख्य शब्द: लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, भारतीय अर्थव्यवस्था, बिहार, रोजगार सृजन, गरीबी उन्मूलन, ग्रामीण विकास, मूल्य श्रृंखला, प्रवासी आय, कौशल विकास।.