चित्रा मृद्गल का रचना संसार
जिज्ञांषु पाठक, शोधार्थी, हिन्दी, जनता इण्टर कॉलेज बोहिच मीरापुर, बुलंदशहर (उ0प्र0).
प्रो0 (डॉ0) शैलेन्द्र कुमार राव, असिस्टेण्ट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, अकबरपुर डिग्री कॉलेज, अकबरपुर, कानपुर देहात
DOI: 10.70650/rpimj.2025v1i2000010
DOI URL: https://doi.org/10.70650/rpimj.2025v1i2000010
Issue: Vol. 1 ★ Issue 2 ★ October - December 2025
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सारांश:

चित्रा जी की लेखनी को उपन्यास, कहानी तथा लघुकथा इन तीनों विधाओं पर सफलतापूर्वक अधिकार प्राप्त है। अपने लेखन को महिलापन से बचाते हुए उन्होंने अपने उपन्यास तथा कहानियों में वर्गीय सीमाओं का अतिक्रमण कर निम्न वर्ग के पक्षधर रचनाकार के रूप में अपनी पहचान बनाई है। फलस्वरूप उनका साहित्य महानगरीय तथा ग्रामीण अहसासों का सजीव साहित्य बन गया है। महानगरों में पनप रही झोपड़पट्टियों तथा ग्रामों में पनप रही गरीबी, अशिक्षा, शोषण, अंधविश्वास आदि समस्याओं के चित्रण में चित्रा जी की मजबूत पकड़ है। साथ ही घर, परिवार तथा अपने आस-पास की जिन्दगी से संलग्न सभी छोटी-मोटी आशा-आकांक्षाओं को वहन करने वाले पात्रों की सृष्टि उनकी साहित्यिक विशेषता है। आजकल सामान्यतः हर महिला लेखिका के साहित्य पर स्त्रीवादी साहित्य होने का ठप्पा लगाया जाता है, मानों उन्होंने विषय का विभाजन ही कर लिया हो कि हम केवल स्त्रियों के जीवन पर ही साहित्य रचेंगे, लेकिन चित्रा जी का साहित्य इस ठप्पे से अछूता है। इसका कारण यह है कि उनका साहित्य न स्त्री-केन्द्री है, न पुरुष-केन्द्री, बल्कि वह तो मानव-केन्द्री है। उनकी समस्त रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, सम्बन्धों, रिश्तों, जन-चेतना जागृति, महिला सबलीकरण एवं साक्षरता, सामाजिक न्याय, अभिजात्य एवं सामंतवादी वर्ग के दमन, शोषण, भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके साहित्य में समाज के कमजोर वर्गों, दलित वर्गों तथा नारी वर्ग के प्रति जो संवेदना एवं सहानुभूति मिलती है, वह प्रशंसनीय है। उसमें ग्रामीण-शहरी यह भेद नहीं है। अमीर, गरीब, नौकरीपेशा, व्यवसायी, किसान, मजदूर, बेरोजगार, महलवासी, झोपड़पट्टी निवासी सभी उनके साहित्य के विषय हैं। उनके कथा साहित्य में विषयांे, पात्रों, समस्याओं की इतनी विविधता है, कि जिसके कई आयाम निरूपित किए जा सकते हैं।