स्त्री आत्मकथाओं में प्रेम-यौनिकता और सामाजिक निषेध
बालिका कांबळे, सहयोगी प्राध्यापक, हिंदी विभाग, श्री कुमारस्वामी महाविद्यालय, औसा, लातूर (महाराष्ट्र)
DOI: 10.70650/rpimj.2026v2i200006
DOI URL: https://doi.org/10.70650/rpimj.2026v2i200006
Issue: Vol. 2 ★ Issue 2 ★ April - June 2026
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सारांशः:

सामाजिक संरचना का निर्माण अनेक विषमताओं के उपरान्त हुआ है। समाज की स्थित प्राचीन काल मंे अत्यंत अस्थिर थी तथा समाज पूण्ररूप से विश्रृंखलित था। हमेशा नारी को केन्द्र में रखकर सामाजिक दंगे हुआ करते थे। आदिकाल में सामाजिक नियम न होने के कारण स्त्री की दशा अत्यंत दयनीय थी। स्त्री की स्थिति फुटबाल जैसी थी। स्त्री वस्तु के रूप मंे छीना-छपटी की शिकार थी। इतिहास इस बात का साक्षी है कि मध्यकाल तक और छुटपुट वर्तमान समय में भी स्त्री युद्ध का कारण है। रामायण काल तथा महाभारत काल की संरचना ही स्त्री पर केन्द्रित है। सृष्टि की संरचना में पुरुष की अपेक्षा नारी की शारीरिक संरचना अत्यध् िाक भिन्न है। नारी के शारीरिक अंग आकर्षण के केन्द्र हैं। मानव हमेशा से आकर्षण वस्तु का ग्राहक रहा है। हिन्दी साहित्य में अधिकतर साहित्यिक रचनाएँ स्त्री पर ही केन्द्रित हैं। इसका कारण यह है कि जब तक नारी की रचना सृष्टि में नहीं हुई थी तब तक पुरुष अपूर्ण था तथा संसार की गति स्त्री के बिना बाधक थी। जब से पुरुष के साथ-साथ स्त्री का प्रादुर्भाव हुआ तब से यह संसार अबाध गति के गतिमान है। समाज को पारदर्शी बनाने के लिए कुछ नियमांे की आवश्यकता होती है। प्रस्तुत शोधालेख आत्मकथाओं में प्रेम यौनिकता तथा सामाजिक निषेध इसी का जीवंत दस्तावेज है।

मुख्य शब्द: स्त्री, आत्मकथा, प्रेम, समाज, प्राचीन, संरचना, विषमता, विश्रृंखलित, केन्द्र, आदिकाल, नियम, सामाजिक, दयनीय, फुटबाल, वस्तु, इतिहास, युद्ध, संरचना, सृष्टि, पुरुष, पारदर्शी तथा प्रादुर्भाव आदि।.