एक दृष्टि मे साकेतानंदक कथा साहित्य
चन्देश्वर राम, शोधार्थी, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल.ना.मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा
डॉ0 राज कुमार राय, शोध पर्यवेक्षक, सहायक प्राचार्य, मैथिली विभाग, वि० सिं० जनता. महाविद्यालय, राजनगर, मधुबनी
DOI: 10.70650/rpimj.2025v1i200004
DOI URL: https://doi.org/10.70650/rpimj.2025v1i200004
Issue: Vol. 1 ★ Issue 2 ★ October - December 2025
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सारांश:

साहित्य समाजक सापेक्ष सृजित होइत अछि। मानवक जीवन-यापनक पद्धतिमे समयानुकूलता जेना-जेना परिवर्त्तन होइत छैक, तहिना साहित्यमे सेहो परिवर्त्तन होइत छैक। रचनाकार एहि परविर्त्तन केँ कथ्य, शिल्प आ प्रस्तुतिक माध्यमे अपन रचनामे अभिव्यक्त करैत अछि। एहि परविर्त्तनक अभिव्यक्ति विभिन्न ढ़ंगक परिणाम स्वरूप नव-नव प्रवृत्तिक जन्म होइत छैक।१ कथा एकर एकटा विलक्षण दृष्टांत अछि। कथाक रचनाक आधार प्रमुख प्रवृत्तिक होयब अस्वाभाविक नहि होइत अछि। ई सुधारवादी, आदर्शवादी, ऐतिहासिक, पौराणिक, धार्मिक, भावात्मक, मनोविश्लेषणात्मक, कामपरक, हास्य-व्यंग्य, राजनैतिक, प्रगतिवादी, यथार्थवादी, समाजवादी, जनवादी आदि होइत अछि। एहि प्रवृति केँ मैथिली साहित्यक मर्मज्ञ कथाकार डॉ. अशोक कुमार मेहता, एखन धरि मैथिलीमे उपलब्ध कथाक आधारपर प्रमुख प्रवृत्तिकेँ रेखांकित उपरोक्त रूपेँ कयलनि अछि। ओ कथा मादे कहैत छथि- साहित्य समाजक सापेक्ष सृजित होइत अछि। मानवक जीवन-यापनक पद्धतिमे समयानुकूल जेना-जेना परिवर्त्तन होइत छैक, तहिना साहित्यमे सेहो परिवर्त्तन होइत छैक। रचनाकार एहि परिवर्त्तन केँ कथ्य, शिल्प आ प्रस्तुतिक माध्यमे अपन रचनामे अभिव्यक्त करैत अछि। एहि परिवर्त्तन अभिव्यक्तिक विभिन्न ढ़ंगक परिणाम स्वरूप नव-नव प्रवृत्तिक जन्म होइत छैक। जे ऊपर अंकित कयल गेल अछि।