हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील विषय रहा है। विषेश रूप से हिन्दी कहानी में स्त्री के अस्तित्व, उसकी पहचान, उसके संघर्ष और उसके सामाजिक स्थान पर गहन चिन्तन हुआ है। यह शोध-पत्र हिन्दी कहानी के माध्यम से स्त्री विमर्श की प्रवृत्तियों, दृष्टिकोणों और विविध आयामों को समझने का प्रयास करता है। हिन्दी कहानी और स्त्री विमर्श- हिन्दी कहानी में स्त्री विमर्श को अनेक चरणों में विभाजित करके देखा जा सकता है। इसका पहला चरण महिला लेखन से पहले का दौर है जहाँ पुरूष लेखकों ने अपनी संवेदनशीलता के द्वारा महिलाओं की समस्याओं को उठाया गया है। मुख्यरूप से प्रेमचंद के दौर से महिला समस्या को गम्भीरतापूर्वक उठाया गया। बूढ़ी काकी, नया विवाह, गिला जैसी कहानियाँ। इसके उपरान्त जैनेन्दं ने अपनी कहानियों में नारी मन की सूक्ष्म परतों का विश्लेषण किया। यशपाल ने भी मार्क्सवादी विचारधारा के अन्तर्गत महिलाओं पर किए जा रहे शोषण वंचनाओं को अपनी कहानी में उभारा। दूसरा दौर वह है जब स्वयं महिला लेखिकाएँ बड़ी संख्या में स्वातन्त्र्ाोतर दौर में कहानी लेखन में पर्दापण करती है तथा भोगे हुए यथार्थ को अपने ही कलम से कलमबद्ध करती हैं। इस दौर में यह अवधारणा भी स्थापित हुई की स्त्रियों की वेदना को स्त्रियाँ ही समझ सकती हैं तथा यह भी घोषित किया गया कि संवेदना चाहे कितनी भी तीव्र व गहरी हो वह स्वयं वेदना की बराबरी नहीं कर सकती।